
जनवरी-मार्च-2022 विजय कुमार की रचनाओं पर एकाग्र
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अपने तईं संपादकीय
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विजय कुमार- जीवन वृत
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काश कभी वैसी कविताएँ लिख पाऊँ
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एक बेचैन भारतीय आत्मा
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कविता विजय के जीवन का विस्तार है
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जो भी प्यार से मिला, हम उसी के हो लिये
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तसल्ली भरे सार्वजनिक समय में आपातकालीन द्वार की खोज
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हर शहर के
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विजय कुमार की कविताओं को पढ़ते हुए
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कविता जो एक काव्य स्थिति है
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अब कोई नहीं चीखे है इन वीरानियों में
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मैं शब्दकोशों के बाहर जीवन देख रहा हूं
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जिसमें जिया हुआ जीवन छिपा है, पर जो बोर्नवीटा का विज्ञापन नहीं है
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दोयम दर्जे के समाज में स्त्री नियति
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मुंबई की गलियों से गुजरती विजय कुमार की कवितायें
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विजय कुमार की कविताओं में महानगरीय चिंतन
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विजय कुमार के काव्य की प्रासंगिकता एवं सृजनात्मकता
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बहुत से सच हैं पर कोई भी सच किसी दूसरे सच का हिस्सा नहीं -संदर्भ : विजय कुमार और उनकी कविता
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विजय कुमार - ली जा रही जान-सी पुकारती कविताएँ
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मानवीय संवेदनाओं और अलक्षित जीवन की शिनाख़्त करती कविताएँ
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विजय कुमार की कविताओं में व्यक्त स्त्री संवेदना
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सफेद रंग का स्याह शहर
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विजय कुमार की कविता में हाशिये का जीवन
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विजय कुमार की कविताओं में नगरीय परिवेश
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आशंकाओं, असुरक्षाओं में लिपटा समय
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कविताएँ : विजयकुमार
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डेरेक वॉलकॉट की कविताएँ
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काव्य यात्रा के महत्वपूर्ण प्रस्थान: अदृश्य हो जायेंगी सूखी पत्तियाँ
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जीवन देखने की दृष्टि
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पूरा मनुष्य न हो पाने का दृश्य
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तुम शायद उसे देख नहीं पाओगे
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हम सब खड़े हो जाएँगे और दो मिनट का मौन रखेंगे-विजय कुमार के संग्रह ‘चाहे जिस शक्ल से’ के बारे में
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अंधकार के भीतर से : रात पाली
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मैं ही जले हुए मकानों के भीतर एक बचा रह गया सपना अर्थात आधुनिक सभ्यता के संकट और संताप
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एक कवि की रात पाली
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'चाबियाँ किन्हीं ओझल दरवाज़ों की... ' विजय कुमार की कविता पुस्तक 'रात-पाली' के बहाने
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रात-पाली : स्याह रोशनाई का उजास
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गझिन अंधकार में चमक
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विजय कुमार और उनकी "प्रिय कविताएं"
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काव्य-संकलनों से इतर कुछ कविताएँ : चमकदार समय के घने अंधेरे में संघर्ष और जिजीविषा
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कविता की संगत: विजय कुमार
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काव्य की सहचर आलोचना का प्रति संसार...
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क्या कविता गवाही देगी
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कविता आलोचना में वाज़िब दखल: विजय कुमार
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मलयज : समग्र आकलन का प्रयास
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अंधेरे समय की वैचारिक यात्रा
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विचारों का व्यापक वितान
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एक खोये हुये शहर का रहगुज़र

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